अमृत कलश

Tuesday, December 27, 2011

फैशन का भूत

मुछ मुड़ाफैशन चला है 
आज कल इस देश में 
मर्द भी रहने लगे हैं
औरतों के वेश में |
आँखों पर चश्मा चढाया 
और लाली औठ पर
फूल कढ़वाने लगे हैं 
मर्द अपने कोट पर |
है अगर चूड़ी नहीं तो
है कलाई पर घड़ी
मांग तिरछी भाल पर है
रिंग उंगली में पड़ी |
रंग बिरंगे वस्त्र पहने 
एंठते हर चाल पर 
उस्तरे से छील दाढ़ी
पाउडर है गाल पर |
पैर में सेंडिल सुहाने 
कमर पेटी से कसी 
मटक चलते अनोखी 
चाल मस्ती से भरी|
देखलो  दोस्तों 
मैं कुछ कहता नहीं 
आज नर नारी बना है 
बिन कहे रहता नहीं |
किरण


Thursday, December 22, 2011

पहेलियाँ

बूझो तो जाने
१-
चाटुकार है वह गरवीला ,बड़ी निराली उसकी लीला
जैसा देखे तुरत बतावे ,हर घर में वह आदर पावे |
२-
आगे आगे आप चले तो पीछे पीछे लाल
टूटे हुए अंग को जोड़े देखो सखी कमाल |


Sunday, December 18, 2011

पितृ भक्त देव व्रत(भाग४))

अंतिम किश्त :-
पर यह प्रण करना होगा राजन इसके सूत सारे
पावेगे राज्य अधिकार ,कोइ न और पग धारे |
चिंतित हो राजा घर लौटे ,खान पान सब ही छोड़े
राज काज सब छूट गए ,सुख चैन गए मुख को मोड़े|
देख पिटा की दशा ,देव ब्रत आ कर उनसे यह बोले
कौन कष्ट है पिता बताएं ,निज सूत की शक्ति तोलें |
सुन कर सूत के वचन ,लाज से राजा कुछ न कह सके
और देवव्रत उनकी दशा देख कर ,चुप हो रह न सके |
कुछ मंत्री से हाल सुना ,फिर दौड़े जमुना तट पर आए
राजा की चिंता का कारण जान हृदय में सकुचाए |
तब कुमार ने कहा "बात यह नहीं बड़ी भारी
कुछ भी पितृ देव से नहीं अधिक है ,और वास्तु प्यारी कुछ भी "|
मैंने राज पाठ सब छोड़ा ,जाओ कन्या को ले आओ
राजा को कर भेट जगत में ,शान्ति ,कीर्ति ,यश ,सुख पाओ |
है इतनी ही नहीं बात ,इससे भी आगे है राजा
पुत्र करेंगे राज तुम्हारे ,रोकोगे कैसे राजा |
सुन निषाद के वचन ,देवव्रत ने माता का ध्यान किया
और स्वस्थ हो शांत चित्त से ,सब शंका का ट्रां किया |
देव गंधर्व और मनुज ,पशु पक्षी सब आज सुनें
यह गंगा सूत प्रण करता है ,इसे ध्यान से सभी सुनें |
जब तक सूर्य चंद्र ज्योति हैं ,गंगा जमुना जल धारा
हो अस्तित्व धरा का जब तक ,देव राज्य जग पर प्यारा |
साक्षी हों वे देव पितृ सब ,साक्श्री हो गंगा मैया
राज्य करेंगे इस पृथ्वी पर ,सत्य वती के सुत मैया |
मैं आजन्म ब्रह्मचारी रह ,सेवक भर कहलाऊंगा
उनकी रक्षा में अपना तन मन भी भेट चढाऊंगा |
धन्य धन्य सब कह उठे सभी ,फूलों की फिर बरसात हुई
भीष्म प्रतिज्ञा भीष्म देव की ,थी घर घ की बात हुई |
यही नहीं जब भीष्म पितामह शर शैया पर सोए थे
उनके शव पर वासुदेव भी ,हिचकी भर भर रोए थे |
अब ऐसे सुत कहाँ मिलेंगे ,पितृ भक्त पंडित ज्ञानी
दृढ प्रतिज्ञ सर्वज्ञ वेद विद ,निज कुल रक्षा के मानी |
धन्य भाग्य थे भारत भू के ,ऐसे वीर यहाँ आए ,
धन्य भाग्य थे उस जननी के ,ऐसे सुत जिसने पाए |
किरण







Tuesday, December 13, 2011

पितृ भक्त देव व्रत(भाग ३ )

छत्तीस वर्ष बीतने पर
गंगा तट आ नृप ने देखा
है अवरुद्ध धार जल की
बहती गंगा ज्यों कृष् रेखा |
लगे खोजने राजा कारण
दिव्य पुरुष देखा उनने
निज वाणों से राह रोक दी
गंगा जी की भी जिनने |
ज्यों ही द्रष्टि पड़ी राजा पर
युवक तिरोहित हुआ वहीं
पाया नहीं निशाँ उन्होंने
बहुत खोज की बृथा रही |
तब गंगा से कहा नृपति ने
उस कुमार को फिर लादो
एक बार ही ओ कल्याणी
वह सुन्दर नर दिखलादो |
निज सूत का दक्षिण कर गह कर
तब गंगा सन्मुख आई
राजा यह लो पुत्र तुम्हारा
कह कर थी वह मुसकाई |
धीर वीर ज्ञानी पंडित है
इसे न कुछ भी कमीं रही
यह कह सूत को सौप जान्हवी
तभी तिरोहित हुई वहीँ |
निज सूत को पा राजा हर्षित
हो कर राज महल आया
उसे बना युवराज प्रेम से
बहुत हृदय में हर्षाया |
गंगा सूत ये ही थे सुन्दर
जो देवब्व्रत कहलाए
करके भीषण प्रण ये ही फिर
भीष्म पितामंह कहलाए |
उनकी उसी प्रतिज्ञा की
अब कथा यहाँ पर आती है
जो द्वापर युग से अब तक
सत्पथ हमें बताती है |
यमुना के तट पर एक दिवस
शांतनु मृगया को गये जभी
एक विचित्र गंघ उनके
मानस में आ भर गयी तभी |
इसका कारण खोज रहे थे
तभी देखी सुन्दर बाला
जिसकी रूप राशि ने
नृप को मोहित कर डाला |
राजा बोले ए कल्याणी
तुम किसकी कन्या प्यारी
कौन तुम्हारा पिता
धन्य वह कौन तुम्हारी महतारी |
वह बोली यमुना तटवासी
धींवर की कन्या हूँ मैं
धर्म हेतु हूँ नाव चलाती
पार तुम्हें क्या कर दूं मैं |
नृप बोले मैं पास तुम्हारे
पितृ देव के जाता हूँ
तुम रानी बन जाओ हमारी
यह आज्ञा ले आता हूँ |
यह कह कुटिया पर आकर
धींवर से सब बात कही
वह प्रसन्न हो बोला राजन
बात तुम्हारी सही सभी |
क्रमशः-------

किरण



Wednesday, December 7, 2011

पितृ भक्त देवव्रत (भाग २)

महा प्रतापी शांतनु उस
राजा के पुत्र हुए ज्ञानी
कुरु कुल श्रेष्ठ कहाये
जिनकी सत्ता देवों ने मानी |
देखा जब चौथा पन आते
नृप प्रतीप सुत से बोले
राज्य करो तुम हे सुत ज्ञानी
देव मनुज भय से डोलें |
कर राज्याभिषेक नृपति
निज सुत का जंगल को आये
तप में रत रह प्राण त्याग कर
स्वर्गलोक में जा छाये !
एक दिवस आखेट खेलने
आये शांतनु गंगा तट |
देख पूर्व पति गंगा सन्मुख
आई नारी बन झटपट !
उसका सुन्दर रूप देख
शांतनु का मन था रीझ गया
यूँ न मुझे पाओगे राजा
यह कह हँसती रही जया !
मैं जो चाहूँ वही करूँगी
रोक नहीं पाओगे तुम
यदि रोकोगे चली जाऊँगी
फिर न मुझे पाओगे तुम |
दे सकते हो अगर वचन यह
तो यह शुभ संस्कार करो
मैं पत्नी हूँ देव तुम्हारी
चाहो तो स्वीकार करो !
दिया वचन राजा ने सुख से
ब्याह उसे फिर घर लाया
राज भवन मैं रौनक आई
जनता में आनंद छाया |
गंगा ने बरसों राजा की
सेवा में तनमन वारा
इसी समय में सात बार
वसुओं को गर्भ बीच धारा |
किन्तु जनमते ही उन सब का
था उसने उद्धार किया
निज वचनों को पूर्ण किया
उन सबको पार उतार दिया |
पुत्र आठवाँ होते ही
राजा बोले "अब न्याय करो
इसे मुझे अब देदो देवी
अब न अधिक अन्याय करो |"
"राजा तुमने वचन दिया था
मैं चाहूँ जो कर सकती हूँ
रोक न पाओगे तुम मुझ को
चाहूँ तो मैं मर सकती हूँ |
किन्तु तुम्हारे पास नहीं मैं
बिलकुल रहने पाऊँगी
निज सुत को भी पालन हित
अपने संग ले जाऊँगी |"
यह कह गंगा सुत का कर गह
गृह त्यागी बन चली गयी
शांतनु जैसे ज्ञानी की भी
यहाँ बुद्धि थी छली गयी |
-------क्रमशः








Sunday, December 4, 2011

पितृ भक्त देवव्रत (भाग एक )

एक समय था ऋषि वशिष्ट से
शापित वासु गण हो कर के
गंगा को आ कथा सुनाई
निज पापों को रो कर के |
गंगा ने तब कहा, "शोक को
छोड़ो ऐ वसु विज्ञानी
गर्भ धारिणी मृत्यु लोक में
बनूँ तुम्हारी मैं मानी |
फिर मैं तुमको श्राप ताप से
मुक्त उसी क्षण कर दूँगी
तुम निज गौरव लौटा पाओ
ऐसा साहस भर दूँगी |"
यह कह गंगा मृत्यु लोक में
निज आश्रम को लौट गई|
पौरव पति प्रतीप की भक्ति
देख हर्ष से चकित हुई
बोली, "राजन हो प्रसन्न
घर जाओ, सुत वर पाओगे |
मैं उसकी पत्नी होऊँगी
तुम सब सुख भर पाओगे |"


किरण

Sunday, November 27, 2011

पहेलियाँ

(१)
हरे बाल हैं भूरा तन ,
पर है मीठा मेरा मन
बच्चों मुझे चाव से खाओ ,
पर तुम पहले नाम बताओ |
(२)
भूरा किला श्वेत है नारी
काली है उसकी महतारी
सरस रसीली मन को भावे
कौन गुनी जो नाम बतावे |


किरण

Thursday, November 24, 2011

पहेली के सही उत्तर

पिछली पहेलियों के सही उत्तर हैं
१- पंखा
२-लौंग
आशा

Thursday, November 17, 2011

पहेलियाँ

(१)
सारे दिन करता हूँ काम
देता हूँ सब को आराम
इक पल कभी न थकता हूँ
आज्ञा पा कर रुकता हूँ
या तो कहदो मेरा नाम
अथवा छोडजाओ तुम ग्राम|
(२)
भूरा मुंह पर अंग है काला
खाते हैं सब इसको लाला
पैर एक पर चार कान हैं
मेरा सब में बड़ा मान है |
किरण

Sunday, November 13, 2011

चाचा नेहरू

ओ अमर राष्ट्र के सेनानी
तुमको शत शत प्रणाम
हम आज मनाने आते हैं
तव वर्ष ग्रंथि यह सुख सानी
हम आज मनाते दीवाली
सद्भाव ज्योति से मन मानी |
हम आज मना त्यौहार रहे
कर निज चाचा का अभिनन्दन
हम दिखा ह्रदय का भाव रहे
कर कर के सादर पद वंदन |
यह शरद निशा भी लुटा रही
अपने आंचल से पुष्प अमल
खिल रहे सागरों के उर पर
ये पञ्चशील के सुदल कमाल |
दृढ लग्न और कर्त्तव्य दिखा
नव ज्योति जगा दी जन जन में
चाचा नेहरू के मुक्त गीत
भर गये विश्व के कण कण में |
गंगा यमुना का पावन जल
जब तक हिलोरें लेगा
यह दीप दिवा का निज प्रकाश
जब तक पृथ्वी को देगा |
यह पूर्ण चन्द्र दे प्रभा
देश में अमन क्रान्ति बिखाराएगा
श्री नेहरू अमर रहें तब तक
सदभाव देश में छाएगा |
ओ भाग्य विधाता भारत के
ओ अजय सत्य के पुन्य धाम
ओ अमर राष्ट्र के सेनानी
सादर प्रणाम शत शत प्रणाम |

Friday, November 4, 2011

पहेलियाँ

(१)
फूलों में फूल कहाऊँ ,और सागों में साग
उलट पढोगे भीग जाओगे ,जल्दी जाओ भाग |
(२)
अंत कटे बोझा बनूँ ,मध्य कटे तो धान
आदि कटे दृढ लग्न हो ,रखना इसका मान|
(३)
मैं नित दौड लगाती हूँ ,सबकी प्यास मिटाती हूँ
खेत और खलियान सभी ,देते मुझ को मान |

ज्ञान वती सक्सेना 'किरण '


Sunday, October 30, 2011

मातृ भक्त गरुड़ (भाग -२ )


पिछले भाग -१ से आगे -------

एक दिवस निज सुत संग विनता
सुख से बातें करती
बैठी थी प्राचीन कथा कह
सूत का थी मन भरती |
कद्रू आई कहा मुझे
वारिध के भीतर जाना
नागों का है तीर्थ वहाँ पर
देख मुझे है आना |
विनता निज कंधे कद्रू
सुत पर नागों को रख कर
चली बोझ ले कहा गरुड़ ने
माता से यों दुःख कर |
मा क्यों हमको नागों की
आज्ञा पर ही चलना है
मा बोली मैं दासी हूँ
यह इन सब की छलना है |
अब तुम ही मेरी इस विपता को
बेटा हर सकते
मेरे उर में लगे हुए
घावों को तुम भर सकते |
हों कर चकित गरुड़ ने पूंछा
यह सब कैसी माया
तुमको मौसी की दासी ही
बनना क्यों कर भाया |
बिनता ने अपनी बाजी व
कद्रू का छल बताया
जिसके कारण दासी पद
पाने का अवसर आया |
हों कर दुखी गरुड़ सर्पों से
बोल "हें बडभागी
क्या प्रिय करूँ तुम्हारा
जिससे छूटे माँ अभागी "
नागों ने तब कहा "पक्षी वर
हमको अमृत लादो
हम माता को मुक्त करेंगे
अपना तेज बतादो "
उनकी बात माँ बिनता सुत
अमृत लेने धाए |
भूख मिटाने एक द्वीप के
थे निषाद सब खाए
किन्तु भूल से एक ब्रह्मण
उनके मुख मैं आया
जिससे तालू लगा चटकने
ओर महा दुःख पाया|
फिर कश्यप मुनि की आज्ञा से
हाथी कछुआ ले कर
सुबरण गिरी के स्वर्ण शिखर पर
पहुंचे रास्ता तय कर |
उनको खा कर धीरे धीरे
स्वर्ग लोक में आए
उनके आने का आशय लख
देव इन्द्र धबराए |
हुआ भयंकर युद्ध देव गण से
थे खग वर जीते
स्वर्ण शरीर धरा
अमृत घर तक पहुंचे मन चीते |
देखा चक्र भयंकर उसकी
रक्षा में तत्पर है
चारों ओर अस्त्र चिपके हैं
रुकता न पल भर है |
सूक्ष्म रूप कर धारण उसमे
हो कर भीतर आये
दो भीषण तम सर्प सदा
रक्षा में तत्पर पाए |
करके द्वन्द युद्ध सर्पों से
उनका नाश किया फिर
ले अमृत घर चले
प्रभु से ये वर पाए सुन्दर |
प्रभु ने कहा रहोगे मेरे ध्वज में
ओ पक्षी वर
और अमर हो करमेरे
होवोगे वाहन सुखकर |
प्रभु से सुखदाई वर पाकर
आगे को ज्यों धाए
चेतन हीन देवताओं ने
उठ कर के इंद्र जगाए |
हो सचेत इंद्र ने अपना
फिर से बज्र चलाया
एक पंख से हीन बन कर
लौट बज फिर आया |
इससे नाम सुपर्ण हुआ
अरु इंद्र मित्र बन आया
सर्प बने भोजन सामिग्री
उससे यह वर पाया |
घट ला कर के कुश पर रक्खा
फिर नागों से बोले
हो पवित्र चाखो अमृत को
पहले कोइ न खोले |
हो प्रसन्न सब नाग नहाने
गए वहाँ से नद तक
इंद्र ले गया आ घट
वे लौटे जब तक |
देखा वहाँ पर अमृत हीन
पड़ा कुश सूना |
खाली कुश को देख ह्रदय में
दुःख उमढ़ा फिर दूना
अमृत के लालच में पड़कर
तब कुश को ही चाटा |
उसकी तीखी कोरों नें
उनकी जीभों को काटा
इस प्रकार पक्षी वर ने
साहस का खेल दिखाया
कर माता को मुक्त दासता से
महान सुख पाया |
मा की सेवा बड़ी जगत में
इस बिन सब सूना है
माता पड़ी कष्ट में हो तो
सूत को दुःख दूना है |
है यह सार महान गरुड़ के
सुन्दर सुखद चरित का
माता का सेवक सुख पाता
हो भागी शुभ गति का |
किरण






Saturday, October 29, 2011

मातृ भक्त गरुड़ (भाग -१ )

बहुत पुराणी कथा एक
जब अमृत मथा गया था
उच्चेश्रवा नाम का घोड़ा
उससे प्रकट हुआ था |
कद्रू विनता नाम सहोदर
बहिने वहाँ खड़ी थीं
कौन रंग है इस घोड़े का
इस पर पड़ी अड़ी थीं |
विनती बोली बहिन अश्व वह
श्वेत रंग का भारी
कद्रू बोली सच है
लेकिन दुम काली है सारी |
शर्त लगाई दौनों ने
जो भी जीतेगी बाजी
मालिक होगी ,और दूसरी
दासी राजी राजी |
कद्रू के सहस्त्र सुत थे
जो नाग कहे जाते थे
थे सब को दुःखदाई
उनसे सुर न जीत पाते थे |
अपनी जीत जताने को वह
निज पुत्रों से बोली
जा चिपटो घोड़े की दुम से
हो काली वह धोली |
किसी भांति बीती रजनी
आया प्रभात सुख कारी
तब दौनों ने घोड़े तक
जाने की की तैयारी |
दौनों वे आकाश मार्ग से
फिर घोड़े तक आईं
चन्द्र प्रभा सा श्वेत अश्व
पर दुम थी काली पाई |
कद्रू हुई प्रसन्न बहुत
विनता उदास मुरझाई
दासी बनी बहिन की वह
दुःख से मन में घबराई |
ये दौनों थीं दक्ष सुता
कश्यप मुनि की गृहरानी
दौनों धर्म प्राण थीं सुन्दर
तेजस्वी गुण खानीं |
हो प्रसन्न कश्यप मुनि इक दिन
बोले लो वर सुन्दर
कद्रू के होवें हजार सुत
विनता के दो सुख कर |
अवसर आया जब कद्रू ने
शुभ सहस्त्र सूत जाए
तब विनता ने दो ही अंडे
विधि विधान से पाए |
किन्तु देव गति ने उसकी
मति पर था पर्दा डाला
समय पूर्ण होने से पहले
एक भग्न कर डाला |
तब अपूर्ण तेजस्वी बालक
उससे बाहर आया
कैसा पाप किया माता ने
यह उसने बतलाया |
वह बोला माँ हाय किया
तूने अनर्थ भारी
इससे भगनी की दासी
बनने की कर तैयारी |
जब होंगे शत पांच वर्ष
तब दूजा सूत आवेगा
वह तेजस्वी तुम्हें श्राप से
मुक्त करा पाएगा |
यह कह कर वह रवि सूत बना
रख अरुण नाम जग भाया
सूर्य देव की सेवा कर
निज जीवन धन्य बनाया |
इसी श्राप से विनता कद्रू की
दासी थी मानी
दूजे सूत की नित्य प्रतीक्षा
करती थी अभिमानी |
अंत हुआ विनता के दुःख का
वह शुभ अवसर आया
महा तेजधारी सूत उसने
तब अंडे से पाया |
किरण
(क्रमशः) भाग दो का इंतज़ार करें |
डा.ज्ञानवती सक्सेना की पुस्तक अमृत कलश के सौजन्य से |











Tuesday, October 4, 2011

गुरु भक्त उत्तंग

द्वापर युग में तमसा के तट, था आश्रम सुख कारी
आयोधोम्य नामक ऋषि थे, जिसके कुलपति अधिकारी |
उस में दूर दूर के बालक, शिक्षा पाने आते
ब्रह्मचर्य का समय पूर्ण कर, जग में नाम कमाते |
उस आश्रम में वेद और, आरुणि उपमन्यु रहते
गुरु के संग समान भाव से, सुख दुःख मिल जुल सहते |
तीनों ऋषि को बहुत मानते, आज्ञा पर मरते थे
गुरु या गुरु पत्नी जो कहते, झट उसको करते थे |
वेद बहुत भोला भाला था, और परिश्रम धारी
गुरु आज्ञा से कभी न टलता, था सेवक सुखकारी |
हुए प्रसन्न धौम्य ऋषि उससे, कहा समय अब आया
ब्रह्मचर्य है पूर्ण तुम्हारा, तुमने सब भर पाया |
है आशीष हमारा तुमको, तुम सर्वज्ञ रहोगे
शिष्य रहेंगे आज्ञाकारी, सुख समृद्धि लहोगे |
पा आशीष वेद ने तब, गृह आश्रम में पग धारा
प्रभु चिंतन में लीन सदा रह, सद् उपदेश प्रचारा |
इन्हीं वेद के शिष्य तीन, गुरु आज्ञाकारी सुख कर
थे उनमें उत्तंग सर्व गुण खानी, ज्ञानी सुन्दर |
कर पच्चीस वर्ष पूरण, जब आश्रम छोड़ सिधारे
गुरु ने आशीष दिया, धर्म धन मान लहो सुख धारे |
तब उत्तंग सकुच कर बोले, गुरु दीक्षा क्या लाऊँ
जो आज्ञा हो वही देव मैं, भेंट तुम्हें कर जाऊँ |
गुरु ने कहा मुझे ना कुछ दो, कष्ट न व्यर्थ करो तुम
यदि इच्छा है गुरु माता से, इस पर बात करो तुम |
गुरु माता ने कहा गर्व है, मुझको तुम पर भारी
पोष्य राज्य में जाना होगा, कर लो तुम तैयारी |
उनकी रानी के कुण्डल तुम, माँग यहाँ ले आओ
वही भेंट में दे कर मुझको, सुन्दर आशिष पाओ |
उन्हें पहन कर करना मुझको, ब्रह्मभोज इक भारी
तुम कुण्डल लेने जाओ, मैं करती हूँ तैयारी |
ऐसा करने से मेरी भी, पूरण इच्छा होगी
और तुम्हारे ह्रदय वासिनी, वह वरदायनी होगी |
जो आज्ञा कह चले शिष्य, मारग में आक़र देखा
एक बैल पर महापुरुष, कुछ कहते उनको देखा |
वे बोले उत्तंग न मन में, कुछ भी शंका लाओ
कुछ गोबर ले कर इस पशु का, तुम जल्दी खा जाओ |
यह भविष्य में होगा तुमको, सुखदायी हितकारी
आयोधौम्य भी इस को खा कर, बने महा ऋषि भारी
प्रभु की आज्ञा समझ शिष्य ने, झटपट उसको खाया
बिना आचमन किये तुरंत, फिर राजमहल को आया |
अर्ध्य पाद्य से पूजन कर, राजा ने उसे सन्माना
दर्शन पाकर हो कृतार्थ, निज भाग्य बड़ा कर माना |
अवसर पाकर तब ऋषिवर ने, निज आशय समझाया
कुण्डल लेने गुरु आज्ञा से, यहाँ आज मै आया |
राजा बोले धन्य भाग्य प्रभु, इच्छा पूरण होगी
रानी से जा कहा सुनो, तुम अब बड़ भागी होगी |
देव ऋषि के महा शिष्य, याचक बन कर आये हैं
उन्हें चाहिए कुण्डल, यह संदेशा वे लाये हैं |
रानी बोली "अहोभाग्य, मैं काम किसी के आई
नाथ उन्हें भीतर पहुँचा दो, मैं कुण्डल ले आई |"
राजा जा कर ऋषि को, आदर से भीतर ले आये
पर उनका मुँह जूठा था, रानी न देख वे पाये |
बोले राजन कहाँ तुम्हारी रानी, ना मैंने पाई
"देव आचमन कर लें पहले, तब वह पड़े दिखाई |"
वह पतिप्राणा महा सती है, देख ना पाओ ऐसे
है यह अपनी धर्म नीति, अपमान नहीं कुछ वैसे |
विधि विधान से हाथ पाँव धो, किया आचमन सुख से
तब रानी को देखा उनने, बोले आशिष मुख से |
फिर कुण्डल माँगे, गुरु पत्नी की इच्छा बतला कर
हो प्रसन्न रानी यूँ बोली, कुण्डल हाथ उठा कर
"हे ब्राह्मण लो, सावधान हो करके मग में जाना
तक्षक इन्हें चाहता है, उसके ना चक्र में आना "
आशीष दे उत्तंग चले, गाते गुण प्रभु के प्यारे
पीछे आता था तक्षक, क्षपणक का बाना धारे |
एक नदी के तीर ब्रह्मचारी, कुण्डल को रख कर
उतरे जल में क्षपणक भागा तब तक उनको लेकर |
बाहर आ मुनि सुत ने देखा, कुण्डल वहाँ नहीं थे
तक्षक उनको ले भागा, रानी के शब्द सही थे |
क्रोधित हो कर इंद्र वज्र तब, उस पर ऋषि ने मारा
जिसने नाग लोक तक सारा, उसके पीछे छाना |
हार मान कर भय से व्याकुल, हो कर तक्षक आया
कुण्डल को लौटाल, प्रेम से आशिष पा घर आया|
तब आए उत्तंग गुरु के , आश्रम में हुलासाये
कुण्डल गुरु चरणों में रख कर, खड़े हुए सकुचाये |
गुरु बोले 'हे सुत यह, अपनी माता को दे आओ
तुमने उनकी आन निभाई, जा कर आशिष पाओ |
गुरुपत्नी ने कहा हर्ष से, "सब सुख हे सुत पाओ
सरस्वती लक्ष्मी के वर सुत हो कर नाम कमाओ |
पा आशीष हर्ष से तब वह, गृह आश्रम में आये
गुरु कृपा से सब सुख पाये जीवन धन्य बनाये |

किरण










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Thursday, September 29, 2011

बापू

बापू तुमने बाग लगाया 
खिले फूल मतवारे थे
इन फूलों ने निज गौरब पर 
तन मन धन सब वारे थे |
बावू  तुमने पंथ दिखाया 
चले देश के लाल सुदूर 
जिन की धमक पैर की सुन कर 
महाकाल भी भागा डर कर |
बापू तुमने जोत जलाई देश प्रेम की 
मतवाले हंसते हंसते जूझे जिससे 
शलभ निराले सत् वाले |
बापू  तुमने बीनबजाई 
मणिधर सोए जाग गए 
सुन फुंकार निराली जिसकी 
बैरी भी सब भाग गए |
बापू  तुमने गीता गई 
फिर अर्जुन से चेते वीर 
हुआ देश आजाद मिटी युग युग की  
माँ के मन की पीर |
आ जाओ ओ बापू फिर से 
भारत  तुम्हे बुलाता है 
नव जीवन संचार करो 

यह मन में आशा जगाता है |
अभी तुम्हारे जैसे त्यागी की 
भारत में है कमी बड़ी 
आओ बापू फिर से जोड़ो 
सत्य त्याग की सुघड़ कड़ी |
आशा 







Sunday, September 18, 2011

पूसी और मिन्नी


पूसी मिन्नी नाम एक संग
दो बिल्ली रहती थीं ,
सुख दुःख जो भी पड़ता सर पर
एक साथ सहती थीं |
मिन्नी थी चालाक बहुत
थी पूसी भोली भाली ,
सारे घर की करती थीं
वे चूहों से रखवाली |
शरदपूर्णिमा के उत्सव का
जब था अवसर आया ,
श्री खंड का भोग बना कर
मालिक ने रखवाया |
ऊपर तक था भरा हुआ
काँसे का बड़ा कटोरा ,
पूसी मिन्नी दोनों का
ललचाया हृदय चटोरा |
मालिक के सो जाने पर
खाने की उनने ठानी ,
पर मिन्नी ने चालाकी से
पूसी की न मानी |
दोनों ने तरकीब चली
ले गईं कटोरा बाहर ,
एक महल की खिड़की पर
रख दिया उसे ले जा कर |
कुछ दिन बीते मिन्नी बोली
दीदी मैं जाऊँगी ,
मौसी के घर हुआ लाल है
देख उसे आऊँगी |
यह कह पहुँची वहाँ
छिपाया जहाँ कटोरा जा कर ,
ऊपर ऊपर चट करके
फिर कहा लौट यह आकर |
देखो दीदी उसके सर पर
बाल नहीं हैं बिलकुल ,
सर चट नाम धरा है इससे
हम सब ने मिलजुल कर |
कुछ दिन बीतेफिर मिन्नी ने
कहा मुझे जाना है ,
पहले पहल बनी माँ बहना
उसके घर खाना है |
यों कह गयी महल में
आधा किया कटोरा खाली ,
पोंछ पाँछ मुँह पहुँची घर पर
कहा बजा कर ताली |
दीदी मेरा नया भांजा
सुन्दर बहुत हुआ है ,
अधचट नाम धरा है हमने
करके बहुत दुआ है |
पूसी चौंकी ऐसा अब तक
नाम सुना न देखा ,
अब तक नहीं किसी पुस्तक में
पाया इसका लेखा |
एक दिन सहसा आ बाहर से
मिन्नी बोली उससे ,
अभी सहेली के घर से
आ गया बुलावा फिर से |
उसको अपनी लड़की के
लड़के का करना चटना ,
नामकरण भी हुआ न अब तक
उसको भी है करना |
दौड़ी गयी महल में यह कह
किया कटोरा खाली ,
लौटी बहुत देर से
यह फिर बात बनाई जाली |
जीजी सब चट नाम धरा है
सबने उसका भाई ,
इस विचित्र नाम को सुन कर
पूसी मन मुस्काई |
इसी तरह से धीरे-धीरे
गर्मी के दिन आये ,
खोजे भी जब मिला न भोजन
चूहे भी बिलमाये |
तब पूसी ने कहा चलो
श्री खंड उठा लायें हम ,
उसको खा कर मौज मनायें
प्रभु का गुण गायें हम |
जा कर देख कटोरा खाली
किया अचम्भा भारी ,
मिन्नी को चुप देख समझ
वह गयी दुष्टता सारी |
मिन्नी से बोली अब मैंने
तेरा मतलब जाना ,
सिर चट, अधचट, सब चट का भी
गया भेद पहचाना |
ऐसी दगाबाज को अब हम
साथ नहीं रक्खेंगे ,
जो ऐसों का साथ करेंगे
वे भी फल चक्खेंगे |
इतना कह कर मिन्नी से
पूसी चल पड़ी रिसानी ,
दगा बाज से बचो सदा ही
बच्चों खतम कहानी |


किरण






















Friday, September 16, 2011

बच्चों से

बच्चों सुबह हुआ है न्यारा
छोड़ो अपना बिस्तर प्यारा
सभी बड़ों को शीष झुकाओ
उनसे अच्छी शिक्षा पाओ |
दाँत माँज कर मुँह को धोलो
करो कलेवा बस्ता खोलो
पाठ पढ़ो फिर चित्त लगा कर
जाओ पढ़ने रोटी खा कर |
सादर करो प्रणाम गुरू को
याद करो जो कहें उसी को
यदि ऐसा तुम नित्य करोगे
किसी न दुःख से कभी डरोगे |
सभी करेंगे मान तुम्हारा
जग में होगा नाम तुम्हारा |

किरण

Friday, September 9, 2011

नन्हे फूल


ये हैं नन्हें नन्हें फूल
कभी न इनको जाना भूल
फूल बगीचे में खिलते हैं
बच्चे घर घर में मिलते हैं |
उनकी खुशबू मन को भाती
इनकी चंचलता हर्षाती
वे खिलते हैं औरों के हित
इनकी सुख पहुंचाती स्मित |
जब ये बच्चे बड़े बनेंगे
वीर जवाहर बापू होंगे
इन पर भारत गर्व करेगा
सदा सत्य आशीष वरेगा |

किरण

Sunday, September 4, 2011

एम् एल ए बनने की आकांक्षा

जो मैं एम् एल ए बन पाता 
तो चाचा नेहरू के साथ जा 
मैं गौरव से हाथ मिलाता 
जो मैं एम् एल ए बन पाता |
लोग मुझे भी शीश झुकाते 
घर पर आ कर टेक्स चुकाते 
आदर से नित मुझे बुलाते 
गंगा जल से पैर धुलाते |
मैं हर एक पत्र में अपना 
सुन्दर एक फोटो छपवाता 
नित नए उद्बोधन देता 
नित्य नए उदघाटन करता |
नित्य नए झंडे फहराता 
लंबी चौड़ी बात बनाता 
झूट मूटवादे कर कर के 
अखवारों में नाम कमाता |
नई नई स्कीमें रचता 
रोज नए आश्वासन देता 
कार  सड़क पर नित दौडाता 
जो मैं एम् एल ए बन पाता |
दुनिया को मैं यह दिखलाता 
बहुत व्यस्त हूँ चैन न बिलकुल
रोटी नहीं वक्त पर खाता
जो मैं एम् एल ए बन पाता |
बड़े बड़े नगरों में जाता 
देश विदेश घूम कर आता 
लन्दन अमरीका भी जाता 
अच्छे अच्छे माल उडाता 
इस गांधी टोपी के बल से 
जग के सारे सुख पा जाता |
हाथ  मार दो चार फावड़े के 
मैं श्रम दानी कहलाता 
बंजर भूमि दान में दे कर 
मैं भूदानी भी बन जाता|
हरिजन सेवक संघ खोल कर 
मैं बापू का भक्त कहाता 
जो मैं एम् एल ए बना पाता |
किरण



Monday, August 29, 2011

बापू


बापू तुमने बाग़ लगाया
खिले फूल मतवारे थे
इन फूलों ने निज गौरव पर
तन मन धन सब वारे थे |
बापू तुमने पंथ दिखाया
चले देश के लाल सुघर
जिनकी धमक पैर की सुन कर
महा काल भी भागा डर |
बापू तुमने जोत जलाई
देशप्रेम की, मतवाले
हँसते हँसते जूझे जिससे
शलभ निराले सत वाले |
बापू तुमने बीन बजाई
मणिधर सोए जाग गये
सुन फुंकार निराली जिनकी
बैरी भी सब भाग गये |
बापू तुमने गीता गाई
फिर अर्जुन से चेते वीर
हुआ देश आज़ाद, मिटी
युग युग की माँ के मन की पीर |
आ जाओ ओ बापू फिर से
भारत तुम्हें बुलाता है
नव जीवन संचार करो
यह मन में आस जगाता है |
अभी तुम्हारे जैसे त्यागी की
भारत में कमी बड़ी
आओ बापू फिर से जोड़ो
सत्य त्याग की सुघर कड़ी |


किरण




Tuesday, August 23, 2011

पहेलियाँ

(१)
हरी श्वेत कत्थे सी होती
भरे पेट मैं अगणित मोती
जो भी मुझ को पा जाते हैं
खुशबू से मुंह महकाते हैं |
(२)
मध्य कटे माटी बन जाऊं
आदि कटे तो सोना
अंत कटे सब को डरवाऊँ
खाओ साग सलोना |
किरण

Wednesday, August 17, 2011

परिश्रम का फल



किसी नगर में सड़क किनारे एक पेड़ था भारी
बड़ी बड़ी शाखायें जिसकी फूल बड़े मनहारी |
एक दिवस था उसी वृक्ष पर उड़ता कौवा आया
चना एक निज भोजन के हित दबा चोंच में लाया |
भूखा कौवा छाँह देख कर उस पर बैठा उड़ कर
सोचा उसने भूख मिटा लूँ चना कुरमुरा खा कर |
ज्यों ही चना तने पर रक्खा घुसा छेद में जाकर
निकला नहीं निकाले से कौवा बोला पछता कर |
बहुत दुःख है हाय पेड़ ने मेरा भोजन खाया
मैं तो भूखा ही बैठा हूँ अरे देव की माया |
बहुत सोच वह बढ़ई के घर दौड़ा गया उसी क्षण
बोला पेड़ चीर कर दे दो मेरा खोया लघु कण |
बढ़ई बोला है न मुझे अवकाश भाग तुम जाओ
मेरे पास न आओ पाजी भूखों मरो या खाओ |
कौवा पहुंचा राज महल में राजा से यूँ बोला
राजा बढ़ई को देश निकालो उसने तना न खोला |
राजा बोला अरे मूर्ख तू पास मेरे क्यूँ आया
व्यर्थ समय का नाश किया है गुस्सा व्यर्थ दिलाया |
हो निराश वह पहुँचा भीतर रानी से बोला वह
राजा से रूठो रानी तुम धरना दे बैठा वह
बोला "राजा बात न सुनते बोलो मैं क्या खाऊं
नहीं पास हैं साधन कुछ भी कैसे भूख मिटाऊँ "|
रानी बोली मुझे काम हैं बहुत चला जा भाई
आज्ञा पाए बिना महल में आया शामत आई |
कौआ पहुँचा चूहे के घर बोला कपड़े काटो
रानी है गर्वीली ऐसी उसको जाकर डाटो |
चूहा बोला इनके ही बल पर ही मैं मौज उड़ाता
नहीं करूँगा मैं गद्दारी ऐसा मुझे न भाता |
फिर कौआ पहुँचा बिल्ली घर बोला बिल्लीरानी
चूहे को झटपट खा जाओ करता है मनमानी |
बिल्ली बोली अरे मुझे है पाप मार्ग बतलाता
मैं भक्तिन माला पहने हूँ तुझे नजर ना आता |
तब कौआ कुत्ते से बोला मेरी मदद करो तुम
बिल्ली मार जगत में यश लो बिलकुल नहीं डरो तुम |
कुत्ता बोला मैं पहरे पर आया अभी अभी हूँ
मेरा है कर्तव्य बड़ा, मैं फिर तैयार कभी हूँ |
कौआ डंडे से जा बोला कुत्ता मारो भाई
उसने मेरी बात न मानी, ना ही बिल्ली खाई |
डंडा बोला निरपराध को व्यर्थ दंड क्यों दूँ मैं
जो मर जाए अरे अकारण क्यों सिर अपयश लूँ मैं |
अग्नि पास जा कर तब उसने सारी कथा सुनाई
किन्तु वहाँ भी उसके पल्ले वही निराशा आई |
सागर पास गया वह दौड़ा बोला अग्नि बुझाओ
हो कर के मेरे सहाय कुछ जग में नाम कमाओ |
किन्तु न सागर बोला कुछ भी शांत रहा लहराता
"अरे गर्व से मतवाले है तेरा हरी से नाता |
इसी अकड़ में दीन वचन भी मेरे तुझे न भाते
नहीं सहायता मेरी करता, तुझे दुखी न सुहाते " |
बहुत क्रोध में आक़र वह गज से यूँ बोला जा कर
सागर सोख करो हित मेरा तुम तो हो करुणाकर |
हाथी रहा झूमता खाता वह कुछ ध्यान ना लाया
बहुत हार कर भूखा कौवा चींटी के घर आया |
सारी विपत कथा कह डाली फिर सहायता माँगी
बड़े ध्यान से रही सोचती वह चींटी अनुरागी |
फिर बोली निश्चिन्त रहो तुम मैं हाथी को मारूँ
हाथी बोला , अरे नहीं मैं सब सागर पी डालूँ
सागर बोला अग्नि बुझाऊँ मुझे न व्यर्थ सताओ
अग्नि कह उठी डंडा अभी जला दूँ चल कर, आओ |
डंडा बोला मुझ गरीब पर क्रोध करो मत भाई
मैं कुत्ते को मार भगाऊँ उसकी शामत आई |
कुत्ता बोला मैं बिल्ली को खा कर भूख मिटाऊँ
बिल्ली बोली चूहा खा कर झगड़ा अलग हटाऊँ |
चूहा बोला मुझे न मारो मैं कपड़े काटूँगा
चुन चुन कर सब जरी रेशमी कपड़ों को चाटूँगा |
रानी घबरा उठी रूठ कर राजा जी से बोली
राजा ने बढ़ई बुलवा कर उसकी बुद्धी खोली |
तब बढ़ही ने पेड़ काट कर दाना तुरंत निकाला
भूखे कौए ने तब झट से उसको चट कर डाला |
मिला परिश्रम और साहस का उसको जो उत्तम फल
वरे सफलता और कीर्ति को भोगे वो सुख के पल |


किरण



















Monday, August 15, 2011

पहेलियाँ


(एक )


मैं हूँ एक छोटी सी नारी
भरी पेट में ज्ञान पिटारी
सभी मुझे हैं शीश झुकाते
अपना मन चाहा गुण पाते |
(दो )

शांत हिमालय पर सोती हूँ
पर गर्मीं में मैं रोत़ी हूँ
ये आंसू सागर तक जाते
जो पृथ्वी को भी सरसाते |

किरण





Sunday, August 7, 2011

उपमन्यु

आयोधोम्य ऋषि के दूसरे शिष्य का नाम उपमन्यु था |उसकी परिक्षा लेने के लिए भोजन मिलाने के सभी रास्ते बंद कर दीरे |ऋषि की आज्ञा को वेद वाक्य बिना कुछ खाए रहने लगा |एक दिन भूख से व्याकुल हो कर आक के पत्ते खा लिए |फल स्वरुप वह अंधा हो गया और एक कुए में गिर गया |गुरू ने उसे खोजा और कहा कि वह अश्वनी कुमारों का ध्यान करे |अश्वनी कुमार ने उसे पुआ खाने को कहा |उसने मना कर दिया और कहा कि वह बिना गुरू की आज्ञा के कुछ नहीं खाएगा |जब गुरू ने आज्ञा दी तभी पुआखाया और उसकी आँखें अच्छी हो गईं |इस प्रकार गुरु की ली परिक्षा में वह उत्तीर्ण हो गया और आशीष पा कर सफल बना |
आयोधौम्य के शिष्य दूसरे
जिनका था उपमन्यु नाम
गौओं की रक्षा करने का
गुरु ने उनको सौंपा काम |
कठिन परीक्षा लेने की
गुरु ने इक दिन मन में ठानी
ज्ञात हो सके जिससे
है वह कितना वेद विज्ञ ज्ञानी |
एक दिन गुरू ने पूंचा
बेटा क्या तुम खाते हो
जिससे दिन प्रतिदिन तुम
ऐसे मोटे होते जाते हो |
उपमन्यु बोले" गुरुवार
मैं भिक्षा को नित जाता हूँ
जो कुछ भी मिल जाता है
गुरु अर्पण कर खाता हूँ "
गुरु बोले तुम जो कुछ पाते
वह सब कुछ मुझको ला देना
बिना हमारी आज्ञा के
उसमें से कुछ भी मत लेना
एक दिन फिर पूंछा गुरु ने
"भिक्षा मुझ को ला देते
अब भी हो तुम स्वस्थ
कहो खाने को अब क्या लेते "
उसने कहा " दुबारा जा कर
फिर भिक्षा ले आता हूँ
देवों को अर्पित करके
बस उसको ही खा लेता हूँ "
गुरु बोले "यह महा पाप है
लोभ पाप का मूल मन्त्र है
भाग दूसरों का है वह "
मौन हुए गुरु इतना कह |
कुछ दिन बीते गुरु ने पूंछा
उपमन्यु अब क्या खाते
"दूध गाय का पी लेता हूँ
और नहीं कुछ भी भाता "
कहा उन्हों ने "यह आश्रम की
गाएं है यह उचित नहीं
बिना हमारी आज्ञा के
कुछ भी लेना है फलित नहीं "
एक मांह बीता फिर गुरु ने
पूंछा "अब हो क्या खाते
खाने के सब द्वार बंद हैं
फिर भी मोटे दिखलाते "
"बछड़े पीते समय दूध
फैन गिरादेते भर पूर
बस वही आहार है मेरा
अधिक न कुछ लेता ऊपर"
हरे कृष्ण यह महापाप
तुम कैसे कर पाते हो
दयावान बछड़ो को भूखा
रख कर जो तुम खाते हो
दिन चर्या में रत रह कर
उपमन्यु नित जंगल जाता
जड़ी बूटियाँ पत्ते खा
मुश्किल से भूक बुझा पाता
इसी भाँती कुछ दिन बीते
उसे पत्ते भी नहीं मिले नहीं
एक आक का वृक्ष दृष्टिगत
उसको इक दिन हुआ वहीं
तीव्र भूख की ज्वाला से
पीड़ित हो वे पत्ते खाए
फल यह हुआ कि खाते ही
वे नेत्र अपने गवा आए
जब आश्रम को लौटे वे
ऋषि सुत कब अंध कूप में गिरे
न जाना उनने ,खाई ठोकर कब
लौट न आए आश्रम में
बहुत गुरू ने तब हेरा
बोले यूं पुकार "लौटो सुत
अब संध्या की है बेर "
गुरु किया स्वर पहचान कुए से
वे बोले चिल्ला कर
"मैं गिर पड़ा कुए में गुरुवार
आक तरु के पत्ते खा कर
ज्वाला बुझी पेट की लेकिन
नेत्र गँवा बैठा हूँ
इसी लिए ठोकर खा कर के
लेटा अंध कूप में हूँ मैं "
गुरु बोले अश्विनी कुमारों का
अब तुम आव्हान करो
वे देवों के कुशल वैद्य हैं
बस उनका ध्यान धरो "
गुरु आज्ञा पा ध्यान मग्न हो
वैद्यों का आव्हान किया
सुर रक्षक सब रोग दूर
करने वालों का ध्यान किया
प्रगट हुए तब महाँ विद्या
ले औषधि निश्चित पुआ महा
"गुरु आज्ञा बिन ले न सकूंगा
उपमन्यु ने यही कहा
विद्या चकित हो कर बोले
यह दवा बड़ी गुणकारी है
वह बोला पर बिना गुरु के कहे
पाप यह भारी है "
तब आज्ञा दी गुरु ने उसको
खा कर पुआ नेत्र खोलो
गुरु भक्ति से प्रसन्न हो
वैद्य राज उससे बोले
"गुरु के तुम हो महा भक्त
बच्चे हम यह देते आशीष
दांत तुम्हारे सोने के हों
तुम पर कृपा करेंगे ईश "
और गुरु ने कहा तुम्हें सब
वैद शास्त्र होंगे कंठस्थ
कभी न होगी व्याधि तुम्हें कुछ
सदा रहोगे सुन्दर स्वस्थ
गुरु आज्ञा पालन का बच्चों
है कितना सुन्दर परिणाम
जग में छाती कीर्ति अमर
अरु युग युग तक रहता है नाम
अधोम्य के शिष्य सरीखे
यदि हो अब भारत संतान
उन्नति करता रहे देश
छाए सब जग में कीर्ति महान |

किरण




Wednesday, August 3, 2011

सच्चे लाल


स्वर्ग लोक से परियाँ आईं
किरण नसैनी से हो कर
नन्हे पौधों को नहलाया
ओस परी ने खुश हो कर |
फूल परी ने आ तब उनका
फूलों से सत्कार किया
सोई कली जगाईं पलकें चूम
बहुत सा प्यार दिया |
फिर सुगंध की परियाँ
कलसे भर भर कर पराग लाईं
नन्हे पौधों को सौरभ की
भर भर प्याली पकड़ाई|
देख सूर्य का तेज
लाज से सकुचा कर सब भाग गईं
खेल खेलने पौधों के संग
तितली पाँसे चले कई |
बच्चों पौधों जैसे यदि
उपकारी तुम बन जाओगे
वीर जवाहर बापू से बन
जग में नाम कमाओगे |
तो ये ही सब परियां आक़र
तुम पर प्यार लुटायेंगी
जग में फूलों की सुगंध सी
कीर्ति सुधा फैलायेंगी |
नाम तुम्हारा अमर रहेगा
सब तुमको दुलरावेंगे
ये हैं सच्चे लाल देश के
कह जन मन सुख पावेंगे |

किरण


Tuesday, August 2, 2011

पहेलियाँ के सही उत्तर

पिछली पोस्ट की पहेलियों के सही उत्तर हैं :-

(१) आराम
(२) सूरज

पहेलियाँ

पहेलियाँ बूझो तो जाने :-

(१)

पेट कटे मीठा फल खाओ

शीश कटे रघुवर गुण गाओ

पैर कटे तो काट गिराओ

बच्चों मेरा नाम बताओ |

(२)

बालापन में है हनुमान सा

यौवन है जलता मसान सा

और बुढापा थका हुआ सा

शीश लाज से झुका हुआ सा |

किरण

Saturday, July 30, 2011

आज्ञा कारी आरुणि


आयोधोम ऋषीके आश्रम में दूर दूर से राज कुमार शिक्षा प्राप्त करने आते थे |आरुणि भी उनमें से एक था |
सारे शिष्य बहुत आज्ञाकारीऔर विनम्र थे |ऋषि नें उनकी परिक्षा लेने का मन बनाया |एक दिन बहुत जोर से पानी बरस रहा था |उपयुक्त अवसर जान ऋषिवर ने कहा ,"खेतों में पानी भर रहा है उसे जा कर ठीक कर दो "|
जब अरुणि वहाँ पहुचा और पानी न रोक पाया तब वह खुद मेढ़ की जगह लेट गया और पानी रोकने की कोशिश करने लगा |इस कहानी का यही सार है |

बहुत पुरानी कथा तुम्हें मैं ,बच्चों आज सुनाऊंगी ,
कैसे थे गुरु के आज्ञाकारी ,बालक यह बतलाऊंगी |
आयोधोम के आश्रम में दो बालक रहते थे सुकुमार
गुरुसेवा और विद्या पढ़ना था उनके जीवन का सार |
आरुणि था पांचाल देश का उपमन्यु था उसका मित्र
दोनो विनयी नम्र ह्रदय के गंगा जल से महा पवित्र |
एक दिवस गुरु ने उनकी गुरु भक्ति का अनुमान किया
कठिन परीक्षा के द्वारा उनकी शिक्षा का मान किया |
पावस ऋतु थी सभी और सुन्दर हरियाली छाई थी
लता वृक्ष फल फूलों से शोभा आश्रम में आई थी |
इक दिवस रख रूप भयंकर काले मेघा आ बरसे
जब आश्रम के खेतों में थे धानों के पौधे सरसे |
मेढ़ खेत की टूट गयी जल भरने लगा खेत के बीच
आरुणि गुरु आज्ञा पा उसको लगा बाँधने ले कर कींच |
जल न रुका तब स्वयं मेढ़ की जगह लेट वह गया वहीं
गए खोजने जब गुरु उसको पता न उसका लगा कहीं |
तब उपमन्यु गुरु से बोले "मेंढ़ बाँधने जा कर वह
अभी न आया" "चलो खोजने" बढे गुरूजी कह कर यह |
खेतों में जा की पुकार तब आरुणि उठ कर के आया
सारा तन था उसका गीला पर न मैल मुख पर लाया |
हुए प्रसन्न गुरू जी उसकी इस भक्ति को देख महां
"वेद शास्त्र का ज्ञाता होवो" गुरु ने यह आशीष कहा |
गुरु की सेवा ही से बच्चों सब संकट कट जाते हैं
आज्ञा पालन करके जग में उत्तम नाम कमाते हैं |
इसी लिए तुम प्रण करलो आरुणि से बन जाओगे
गुरु वाक्य को वेद वाक्य जानोगे सब सुख पाओगे |


किरण


Thursday, July 28, 2011

पहेलियाँ -उत्तर

पोस्ट नम्बर २ के सही उत्तर
१-डमरू
२-कलम

Wednesday, July 27, 2011

मुझे बतादे जीजी रानी

नन्हे बच्चे की बाल सुलभ जिज्ञासा जनित प्रश्न और उसकी विदुषी जीजी के तर्कसंगत प्रत्युत्तर में उन प्रश्नों के समाधानों का कितना सुन्दर चित्रण इस कविता में किया गया है ! इसका आनंद आप सब भी उठाइये !


"मुझे बता दे जीजी रानी
उगता चन्दा लाल क्यूँ ?
और देवता होने पर भी
पड़ा काल के गाल क्यूँ ?"
"इस चन्दा ने चकवी की
आशा का रक्त पिया बहना ,
इस चन्दा ने कमल पुष्प की
सुषमा को छीना बहना |
इस चन्दा ने विकल चकोरी की
अग्नि का दान किया ,
इस चन्दा ने निज सुंदरता
पर भी था अभिमान किया |
इसी पाप से इसी शाप से
यह चन्दा है लाल री
और इसी कारण पड़ना भी
पड़ा काल के गाल री |"
"मुझे बता दे जीजी रानी
है काला काला क्या इसमें ?
पूरा कभी, कभी है आधा
यह होता है क्या इसमें ?"
"निज वैभव पर इतरा इसने
संध्या का अपमान किया ,
वह मुस्काई इसे देख तो
नयन बिंदु ही चुरा लिया |
और उषा संग आँख मिचौली
खेल खेलने को आया
आधा कपड़ा बाँध आँख से
उसने थोड़ा उकसाया |
संध्या की वह पुतली इस पर
काला धब्बा लाई थी
आधा पूरा इसे बनाती
इसी खेल की दाईं री |"

किरण

Tuesday, July 26, 2011

पहेलियाँ

बूझो तो जाने :-

(१)
शीश कटे तो मैं मर जाऊं ,
पेट कटे तो मैं डर जाऊं ,
पैर कटे तो ढोल बजाऊँ ,
शिव जी का प्रिय वाद्य कहऊँ |
(२)
हाड मॉस का नाम नहीं है ,
पर डरने का काम नहीं है ,
पल भर में मैं प्रलय मचा दूं ,
एक शब्द नें शान्ति करा दूं |
किरण

Saturday, July 23, 2011

एक कहानी

आज मैं अपनी माता जी श्रीमती ज्ञानवती सक्सेना 'किरण' द्वारा बाल साहित्य पर रचित कविता संग्रह "अमृत कलश " की पहली रचना इस ब्लॉग के माध्यम से आप सब पाठकों तक पहुँचाने का प्रयास कर रही हूँ | आशा है आप को ये रचनाएँ पसंद आयेंगी | आपकी अनमोल प्रतिक्रिया, सुझाव एवं प्रोत्साहन का हृदय से स्वागत है !

एक कहानी

मेरी नानी प्यारी नानी
मुझे सुना दो एक कहानी |
जिसमें चन्दा तारे ना हों
पतझड़ और बहारें ना हों |
परी देव की ना हो कहानी
राजा रानी की न सुहानी |
ना फूलों की, पशु पक्षी की
ना भौरे की, मधुमक्खी की |
ना देवों की, ना दानव की
ना पशुओं की, ना मानव की |
हो वह देश भक्ति की बाँकी
किसने किसकी कीमत आँकी |
किसने उस पर तनमन वारा
कौन देश पर गया उबारा |
किसने गाली गोली खाई
किसने फाँसी सूली पाई |
कौन शत्रु पर टूट पड़ा था
कौन युद्ध में अजय खड़ा था |
कैसे यह स्वतंत्रता पाई
फिर भारत में हलचल छाई |
कैसे आशा छाई सुहानी
मुझे सुना दो वही कहानी |


किरण