Wednesday, February 7, 2024
Monday, February 5, 2024
हाइकु
१-कहना क्या
कैसे ना बहकाये
डर नहीं है
२-कविता पढ़े
गीत बना उसका
मीठी धुन में
३- उसे चाहिए
मेरे प्रेम की चाह
किसी के लिए
४-कोई ना जाने
मेरे मन की बात
यही है ख़ास
५-तेरी मुझसे
बात छुपी नहीं है
यही विशेष
आशा सक्सेना
Sunday, February 4, 2024
सुरभि
तूम सपनों में जीने वाली
थोड़ी भी खुशी मिलेयदि
पूर्ण रूप से उसे समेटने वाली
हो बहुत भाग्य शाली |
सब कुछ पाया तुमने
हुई कृपा ईश्वर की तुम पर
सारी समस्याएं दूर हुई
हालाकि कठिनाई भी कम न आईं |
तुम हो जुझारू मन से मजबूत
कोई भी कार्य कर सकती हो
यदि ठान लो पीछे नहीं हटतीं
यही गुण जीवन में सफल बनाता है |
तुम हो दृढ संकल्प ,मेहनत से नहीं
डरतीं
यही बात तुम्हारी सब को प्रिय लगती
हो मिठभाषिणी ,कर्मठ ,कर्तव्य निष्ठ ,
अपने कर्तव्य से पीछे नहीं हटतीं |
आशा सक्सेना
Saturday, February 3, 2024
आम लड़की से भिन्न हो तुम
है ऐसा क्या तुममें
सब तुम पर होते निसार
है क्या विशेष तुम में
अति का करते तुमसे प्यार |
हो तुम आम लड़की जैसी
पर हर कार्य में निपुण
जो देखता तुम्हें
हो जाता तुम पर निसार |
हो आधुनिक युग की नारी
किसी से कम नहीं
सब कार्य कर सकती हो
किसी की नहीं आस |
आशा सक्सेना
Friday, February 2, 2024
हाइकू
१-उड़ान भरी
कबूतर सामान
नही आराम
२-है मेहनती
किसी से कम नहीं
अलग दिखे
३-संदेश देता
अपनी ही प्रिया को
पत्र दे कर
४-कबूतर है
साथ में कोई नहीं
पत्र वाहक
५-अनुशासन
सीखा रहा किससे
कहाँ जाकर
आशा सक्सेना
है एक गुजारिश
है गुजारिश तुम से
तुमने यह सब सीखा
कब कहाँ कैसे किससे
मुझे भी बताओ सिखाओ |
तुमने मुझसे क्यूँ
यह राज छिपाया
क्या मैं इस योग्य नहीं
तुम से कुछ सीख न पाऊँगी |
पहले बताया होता
मैं अपना अभ्यास जारी रखती
तुमको समाज में शर्म न आती
मैं भी उस सुख से वंचित न रहती |
आशा सक्सेना
Wednesday, January 31, 2024
इधर उधर झांकते ही
इघर उधर झांकते ही
सारा
जीवन बीत गया
यूँही
इधर उधर झांकते
कोई हल
नहीं निकला
इन सारी
हरकतों का |
बेमतलब
की तांका झाकी
सब को
रास न आती
मन को जब
रास न आए
जिन्दगी
ही रूठ जाए |
सही राह
मिलते ही
जीवन सही
पटरी पर
जाने के
लिए अपना मन बनाए
जल्दी से
अपने कदम बढाए |
आशा सक्सेना
Thursday, January 25, 2024
एक दिन की बात है सुबह बहुत ठण्ड थी |मैंने अपनी बाई से
पूंछा इतनी देर कैसे हुई |वह हंस कर बोली मुझे घर का सारा काम
कर के आना पड़ता है |आज नीद नहीं खुली इसी से देर हुई |उसदिन
मुझे गुस्सा आगया मैंने उससे कहा तुम मुझे जबाब देती हो जब काम
करने आई हो तब समय का ध्यान तो रखना ही पड़ेगा |वह इस बात
से नाराज हो गई |बोली सम्हालो अपना घर मुझे क्या खरीद लिया है
और न जाने क्या बकने लगी और अपना सामान उठा कर चल दी |
उस समय तो मैंने काम कर लिया पर ठण्ड का प्रभाव दिखने लगा
मुझ पर दिखने लगा सरदी ने अपना रंग दिखाया और मैं बीमार पड़ गई|
तब उसका कटु भाषण मेरे कानों में गूंजने लगा क्या हमारी जान नहीं है
हमको सरदी नहीं लगती | उसका मन न था काम पर आने का
पर यह जानते हुए कि मेरी तबियत ठीक नहीं रहती उसने कहा था
क्या कुछ छुट्टीनहीं मिल सकती मैंने उसेचिल्लातेyदिया पर दया नहीं आई उस पर
आशा सक्सेना
Wednesday, November 8, 2023
रंग ही रंग
१-सारी दुनिया
रंगा रंग हुई है
कितनी प्यारी
२-रगों की रात
सज रही है कहीं
देखो तो ज़रा
३-रंग ही रंग
बिखरे यहाँ वहां
उसने देखा
४- पांच रंग हैं
आसमान में सजे
दो गौण रहे
५-होली के रंग
सजाए हैं थाली में
कान्हां को रंगा
आशा सक्सेना
कितने रंग जीवन में बिखरे
कितने रंग जीवन में बिखरे
कहाँ से आए जिन्दगी के रंग
देखने को
मिले इस जहां मे |
कोई रंग कैसा कहाँ ठहरा
या लहराया जाने कहाँ |
जो रंग मन को भाया
पहले पास नजर आया
जब पास जाना चाहा
और दूर होता गया |
मन को ठेस लगी दूरी देख
पर मन को समझाया
हर वह वस्तु जरूरी नहीं कि मिले
यदि बिना कष्ट मिल जाएगी
कितना आनंद आएगा यह भी मालूम नहीं|
यही रंग जीवन में जब दिखाई देगा
अदभुद नजारा होगा जब
रंग दिखाई देगा चारो ओर
लोग जानना चाहेगे यह प्राप्ति कैसे हुई
बताने का आनन्द कुछ और ही होगा |
आशा सक्सेना
Thursday, September 21, 2023
मेरी शुभकामना
मन आनंद विभोर है कि मेरी दीदी आदरणीया आशालता सक्सेना जी का एक और नवीन कविता संग्रह, ‘साँझ की बेला’ शीघ्र ही प्रकाशित होने जा रहा है ! यह उनका अठारहवाँ कविता संग्रह है ! एक साहित्यकार के जीवन में यह निश्चित रूप से एक बहुत बड़ी उपलब्धि है ! ‘साँझ की बेला’ से पूर्व उनके 17 कविता संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं ! और हमें गर्व है कि यह उपलब्धि मेरी दीदी श्रीमती आशा लता सक्सेना जी ने अपने अथक एवं अनवरत प्रयासों से हासिल की है !
दीदी में लेखन की गज़ब की क्षमता है और वे जो भी लिखती हैं वह पाठकों के हृदय पर अपनी अमिट छाप छोड़ जाता है ! कई वर्षों से स्वास्थ्य समस्याओं से निरंतर ग्रस्त रहने के उपरान्त भी उनके लेखन की गति तनिक भी शिथिल नहीं हुई बल्कि बढ़ी ही है !
समय के साथ-साथ दीदी के लेखन में दिन ब दिन निखार आया है ! रचनाओं में संवेदना का स्तर सूक्ष्म से सूक्ष्मतर हुआ है और उनके विषयों का फलक तो जैसे आकाश से भी विस्तृत है ! उन्होंने हर विषय पर अपनी कलम चलाई है ! उनके भावों में अतुलनीय गहराई है और वैचारिक स्तर पर भी रचनाएं चिंतनीय, गंभीर एवं भावप्रवण हैं ! उनकी रचनाओं की भाषा सरल, सहज एवं सम्प्रेषणीय है और पाठकों के हृदय पर सीधे दस्तक देती है ! मुझे बहुत गर्व है कि दीदी साहित्य के क्षेत्र में नए कीर्तिमान स्थापित कर रही हैं और उनका लेखन नवोदित साहित्यकारों के लिए प्रेरणा का अद्भुत स्रोत है ! मेरी अनंत शुभकामनाएं उनके साथ हैं ! ‘साँझ की बेला’की मुझे अधीरता से प्रतीक्षा है ! आशा है यह जल्दी ही पाठकों के हाथ में होगी और अन्य पुस्तकों की भाँति ही इसे भी पाठकों का प्यार व प्रतिसाद अवश्य मिलेगा !
अनंत शुभकामनाओं के साथ,
साधना वैद
33/23, आदर्श नगर, रकाब गंज
आगरा, उत्तर प्रदेश
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