अमृत कलश

Thursday, September 21, 2023

 मेरी शुभकामना

मन आनंद विभोर है कि मेरी दीदी आदरणीया आशालता सक्सेना जी का एक और नवीन कविता संग्रह, ‘साँझ की बेलाशीघ्र ही प्रकाशित होने जा रहा है ! यह उनका अठारहवाँ कविता संग्रह है ! एक साहित्यकार के जीवन में यह निश्चित रूप से एक बहुत बड़ी उपलब्धि है ! ‘साँझ की बेलासे पूर्व उनके 17 कविता संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं ! और हमें गर्व है कि यह उपलब्धि मेरी दीदी श्रीमती आशा लता सक्सेना जी ने अपने अथक एवं अनवरत प्रयासों से हासिल की है !

दीदी में लेखन की गज़ब की क्षमता है और वे जो भी लिखती हैं वह पाठकों के हृदय पर अपनी अमिट छाप छोड़ जाता है ! कई वर्षों से स्वास्थ्य समस्याओं से निरंतर ग्रस्त रहने के उपरान्त भी उनके लेखन की गति तनिक भी शिथिल नहीं हुई बल्कि बढ़ी ही है !

समय के साथ-साथ दीदी के लेखन में दिन दिन निखार आया है ! रचनाओं में संवेदना का स्तर सूक्ष्म से सूक्ष्मतर हुआ है और उनके विषयों का फलक तो जैसे आकाश से भी विस्तृत है ! उन्होंने हर विषय पर अपनी कलम चलाई है ! उनके भावों में अतुलनीय गहराई है और वैचारिक स्तर पर भी रचनाएं चिंतनीय, गंभीर एवं भावप्रवण हैं ! उनकी रचनाओं की भाषा सरल, सहज एवं सम्प्रेषणीय है और पाठकों के हृदय पर सीधे दस्तक देती है ! मुझे बहुत गर्व है कि दीदी साहित्य के क्षेत्र में नए कीर्तिमान स्थापित कर रही हैं और उनका लेखन नवोदित साहित्यकारों के लिए प्रेरणा का अद्भुत स्रोत है ! मेरी अनंत शुभकामनाएं उनके साथ हैं ! ‘साँझ की बेलाकी मुझे अधीरता से प्रतीक्षा है ! आशा है यह जल्दी ही पाठकों के हाथ में होगी और अन्य पुस्तकों की भाँति ही इसे भी पाठकों का प्यार प्रतिसाद अवश्य मिलेगा !

अनंत शुभकामनाओं के साथ,

 

साधना वैद

33/23, आदर्श नगर, रकाब गंज

आगरा, उत्तर प्रदेश

पिन – 2

Thursday, January 19, 2023

एक संस्मरण

 

एक दिन बाजार से कुछ सबजी लाने को कहा इनका कोई मूड न था|

इन्होंने कहा  तुम ही क्यों नहीं लातीं या किसी से मंगवालो |

पहले तो बहुत गुस्सा आया फिर खुद ही चल दी सब्जी लेने |

पर जल्दी में थैली लाना तो भूल ही गई थी |जब सब सब्जियां खरीद लीं पेमेंट कर दिया तब सब्जी वाले ने पूछा किस में सब्जी डालूँ |तब मुझे याद आया कि थैली तो घर पर ही रह गई मुझे बड़ी कोफ्त हुई सोचा क्यूँ न यहीं से एक थैली खरीदली  जाए यदि घर थैली लेने गई तो बहुत देर हो जाएगी |तभी एक बहिन जी मेरी ओर आती दिखाई

दीं |उन्हों ने आवाज दी अरे आपका झोला तो राह में ही गिर गया था|

मुझे अपनी लापरवाही पर बहुत शर्मिंदगी नजर आई खैर उनसे थैली ली और धन्यवाद दिया |जैसे तैसे सब्जी ली और घर की ओर चल दी |मन ही मन सोचती जा रही थी मैं भी कितनी लापरवाह हूँ दूसरों की गलतिया खोजती रहती हूँ पर मैं भी उतनी ही लापरवाह हूँ |

आशा

Sunday, November 20, 2022

झरना एक चित्र कार का


 एक दिन एक चित्रकार घर में रहते रहते बहुत बोर हो रहा था |उसने सोचा क्यूँ न मैं जंगल में जाऊं और ऊपर जा कर झरने के पास बैठूं वही से इस झरने की रंगीन स्केच बनाऊँ |धीरे  से उसने अपनी  मम्मीं से पूंछा  वहां जाने के लिए |झरना घर से अधिक दूर नहीं था |मम्मीं ने हिदायतें दे कर जाने की इजाजत दे दी | उसने अपना सामान संचित कर जूते पहन कर झरने के उद्गम स्थल पर जाने की तैयारी करली और बड़े उत्साह से खाने के लिए थोड़ा नाश्ता ले लिया और प्रस्थान किया |

थोड़ी चढ़ाई के बाद कुछ समय विश्राम किया और फिर से चलने को तैयार हुआ |लगभग आधे घंटे के बाद ऊपर पहुंचा |उस समय सूर्य की रौशनी झरने में दिखाई पड़ रही थी |रश्मियाँ पानी में आपस में  खेल रहीं थीं |नजारा बहुत  सुन्दर दिख रहा था |उसने अपना केनवास स्टेंड पर लगाया और चित्र बनाया |सोचा घर  जाकर ही रंग भरूगा |सब सामान इकठ्ठा किया और नीचे चल दिया |झरना इतनी  तेजी से बह रहा था कि वहां से उठने का मन ही नहीं हो रहा था |फिर देर हो रही थी उसने  जल्दी से  कदम बढ़ाए और कुछ ही समय में घर पहुँच कर सांस ली |अब वह  रंगों से अपनी कृति को सजाने लगा |चित्र बेहद सुन्दर बना था |सब ने बहुत प्रशंसा की |

आशा सक्सेना 

Saturday, November 19, 2022

किस से शिकायत करूं

 


मुझे किसी से क्या चाहिए

शिकायत किससे करू

कोई नहीं सुनता मेरी

 हार थक कर आई हूँ

इधर उधर क्षमा मांगी |

किसी ने  सहारा न  दिया मुझे

 अब तक बेसहारा घूम रही हूँ

किसी से सहारे के लिए |

मैंने की अपेक्षा सबसे  अधिक ही

क्या यही थी भूल मेरी

यदि सहारा न दिया दूसरों ने

फिर से क्यों लौटी उन तक |

अपनी आदत न थी कभी

किसी से सहारा लेने की

पर अब समझ लिया है

 अपने आपको  सक्षम बना लेने की  |

अपनी आदतों में सुधार करना चाहा

कोशिश भी की है

 मन का भय भी

समाप्त न हो पाया आज तक |

मन को  संयत किया है

फिर भी अभी तक

 अपने ऊपर विशवास न हो पाया

अपने कदम बढ़ाने में

किसी का सहारा तो चाहिए |

Friday, November 18, 2022

बहुत दिन पहले



जब भी गाँव जाते थे अपने दो मंजिले मकान में ही ठहरते थे |बहुत पुरानी बात है हमारा मकान ऐसा था  कि जब भी ड्राइंग रूम में जाना पड़ता था बाक़ी कमरों से जीने पर से वहां पहुंचना पड़ता था| | बाबूजी रेडिओ पर कोई प्रोग्राम सुनने के लिए वहां ही जाते थे |एक दिन जब सरोजनी नाईदू पर कोई प्रोग्राम आया वे उसे सुनने के लिए उस कमरे में चले गए |भीतर के कमरे में हम दौनों भाई बहिन किसी बात पर आपस में झगड़ने लगे |यह तक भूले कि हम कहाँ थे |आपस में गुत्थमगुत्था   होने लगी  और बात इतनी बढ़ी  कि मेरे भाई ने मुझे जीने पर से धक्का दे दिया पर वह  भी न बच  पाया  उसका मेरे ऊपर गिरना हुआ |उसका  भी मेरे ऊपर से  गिरने के कारण मेरे खून निकलने लगा | सब बहुत घबराए और जल्दी से सामने के अस्पताल में  ले कर भागे |वहां टाँके लगवाए तब जान में जान आई |उस समय दोनो के एकसाथ रोने से  कोहराम मच गया था |तब बाबूजी ने कसम खाई कि जब तक वहाँ रहेंगे नीचे के मकान में ही रहेंगे  | और दूसरे दिन से मकान की खोज बहुत मुस्तैदी से होने लगी | अब तो जब भी कोई आता और मकान की बात चलती बाबूजी उन्हें नीचे के मकान में रहने की सलाह देते |कहते छोटे बच्चों के साथ ऊपर की मंजिल में नहीं रहना चाहिए |

आशा सक्सेना

Tuesday, November 1, 2022

माँऔर बच्चे का सम्बन्ध

 


जब बच्चा बहुत छोता होता  हैं माँ हर बात में रोकती टोकती है |पर धीरे धीरे कब बच्चा बड़ा  हो जाता है बच्चे को  बहुत अजीब सा लगाने लगता है |अगर उसे ऑफिस में देर हो जाए तब भी माँ उसे टोकती है इतनी देर कहाँ हो गई |समय की कीमत समझो समय पर आया जाया करो |नियमित जीवन बहुत उपयोगी होता है |सभी कार्य यदि समय से करोगे कभी समय की कमीं नहीं पड़ेगी |हम भी नौकरी करते थे पर सारे काम समय पर होते थे |बच्चा सोचता है” मैं कब बड़ा होऊंगा माँ की नज़रों में “|पर एक अदि दिन तो टोका टोकी नहीं होती पर फिर से माँ का टोकने का क्रम शुरू हो जाता है |इस आदत में बदलाव कैसे आए ?क्या मैं गलत हूँ ?मुझे सलाह चाहिए आपसे |

              आशा सक्सेना

 

Wednesday, October 19, 2022

प्यार की चर्चा |

 


प्यार की चर्चा

प्यार की चर्चा कीजिए पर समय देख कर| समय की नजाकत का बड़ा महत्त्व है |यदि समय का ध्यान न रखा तब कुछ गलत भी हो सकता है |

मानो किसी के यहाँ कोई दुर्घटना हुई है और आपस में किसी के प्रेम  प्रसंग की वहां कोई बात  कर रहे हैं तब कितना अजीब लगेगा |लोग सुनेगे और मजा भी लेंगे पर आपका मुंह पलटते ही आपकी हंसी भी उडाएंगे |क्यों कि समाज में रहकर अपनी आदतों को बदलना पड़ता है  |हमें समाज के नियमों का पालन करना होता है |तभी हम सफल नागरिक हो सकते है |

आशा सक्सेना