कुछ दिन पहले ही इस मोहल्ले में किराए पर मकान लिया था |तीन चार दिन सामान खोल कर जमाने में लग गए |
मकान
बहुत बड़ा था इसलिए बहुत अच्छा लगा |एक दिन जब सो कर उठे बड़ा कोलाहल मच रहा
था |बड़ा आश्चर्य हुआ मैने कारण जानना चाहा |पडोसन टीना जी ने बताया कि११०
नंबर में रहने वाली आंटी को सब से झगडने में बहुत आनंद आता है |
रोज
किसी न किसी के घर जाती हैं और झगडा करती हैं जब तक आधा घंटे तक लड़ नहीं
लेती उन्हें मजा नही आता |आज जहां वे खडी हैं आज उनका नम्बर है |
तीन
दिन बाद हमारे यहाँ भी आएंगी |और इसके बाद आपका अवसर आएगा |आप अभी से सारे
दावपेच सोच कर रखना |मैने सोचा मजाक कर रहीं हैं |पर दो दिन बाद जब टीना जी
का घर गुलजार नजर आया ११० नंबर वाली के आने से ,सच मैं मैं तो बहुत घबरा
गई |मेरी बहू यह सुन कर बोली," मम्मी आप बिल्कुल चिंता न कीजिए ,बस आप बाहर
ना आना मैं सब सम्हाल लूंगी "|
दुसरे दिन नाश्ता कर के उठे ही थे कि
जोर जोर से दरवाजे पर प्रहार हुआ |शायद मुसीबत आ गई थी |मैं तो अपने कमरे
मैं दुबक कर बैठ गई |११० नम्बर वाली ही आई थी|आते ही शुरू हो गईं |"अरी
कहाँ हो क्या यह भी नही मालूम कि कोई
मिलने आया है "|
सीमा ने कहा ,आपको किससे काम है ,मम्मी तो मंदिर गई हैं "|
उन्हों ने तुनक कर कहा "यह भी नहीं कि बैठने को कहो |चाय पानी पूंछो |क्या तुम्हारी माँ ने यही तमीज सिखाया है "
सीमा
ने कुर्सी ला कर आँगन में डाल दी |वह पहले तो बैठ गई फिर बोली ,"क्या तुम
नहीं बैठोगी ? मैं अकेले ही बैठूं |यह कौनसा तरीका है मेहमान के स्वागत का
?'बिना विराम दिए फिर बोलीं "मैं कोई ऐसी वैसी हूं जो यहाँ बैठूं " |थोड़ी
देर बाद
कहने लगी,"क्या तुम्हारी सास ने कुछ भी नहीं सिखाया है ?" लगभग पन्द्रह मिनिट इसी प्रकार बीत गए |
वह एकाएक तुनक कर बोली,"यहाँ तो किसी से बात करना ही फिजूल है ,
मैं कुछ भी कहूँ यह कोई जबाव ही नहीं देती |मेरा तो आज का दिन ही बर्बाद हो गया |अजीब लोग हैं ऐसा पहले कभी नहीं देखा "|
फिर दो चार गालियाँ दीं और दरवाजा खोल कर बाहर को चल दी |सीमा ने चट से
दरवाजा बंद किया और चैन की सांस ली |मुझे आवाज लगाई ,"मम्मी जी आप बाहर आ
जाइए |अब मुसीबत टल गई है |"
खैर आज सीमा की सूझ बूझ से लड़ने से जान छूटी |किसी ने सच ही कहा है ,"सो बात की एक बात ,सब से भली चुप "|
Posted by
Asha Lata Saxena
at
10:48 am