अमृत कलश

Friday, March 2, 2012

उत्साही एकलव्य (भाग १)

एक बार कौरव पाण्डव सब 
गेंद खेलते मिलजुल 
वहीँ पास में एक कुआ था 
ध्यान नहीं इसका बिलकुल 
गेंद जा गिरी उसमें 
बहुत  वे घबराए
दुर्बल ब्राह्मण देख एक 
दौड़े  वे उन तक आए 
धीरे धीरे उनको 
सारी कथा सुनाई 
कैसे गेंद कुए में पहुची
सब कुछ बात बताई 
सुन कर सारा हाल ब्राह्मण
मन ही मन मुस्काया 
कैसे गेंद बाहर हो सकती 
यह बतलाया 
हंस कर बोले 'बच्चों
क्षत्री हो कर गेंद ना ला सकते 
फिर कैसे तुम निज क्षत्रु को 
जीत हमें दिखला सकते 
देखो तुम्हें बाण विद्या का 
मैं अद्भुद परिचय दूंगा 
बस  सींकों के द्वारा ही 
मैं गेंद तुम्हारी ला दूंगा 
पर पहले तुम सब मिल कर 
मुझको  भोजन ला करवाओ 
मैं दूंगा आशीष तुम्हें 
यश कीर्ति जग में पाओ 
दुर्योधन ने कहा
कृपाचारी को सब बतला दूंगा
आजीवन भोजन छादन की 
सब सुविधा करवा दूंगा
सुन कर सारी बात उनहोंने 
दाल कुए में मुंदरी दी 
और कुए से  बाहर करने 
को सींकों की मुठ्ठी ली 
सींक सींक से बींध गेंद 
बाहर पानी से ले आए
इसी प्रकार अंगूठी को भी
 कूप गर्भ से ले आए |
(शेष  अगले भाग में )----
किरण





13 comments:

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    1. ब्लॉग पर आने के लिए आभार |
      आशा

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    1. अपनी माताजी की रचनाएँ इस माध्यम से प्रेषित करती हूँ |यह वृत्तान्त
      उनकी पुस्तक अमृत कलश से लिया है |ब्लॉग पर आने के लिए आभार |
      आशा

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  3. एकलव्य की कथा सदैव बहुत प्रेरित करती है ! विशेष रूप से मम्मी ने इसे लिखा भी अद्भुत तरीके से है ! अगली कड़ी के लिये बहुत प्रतीक्षा मत करवाइयेगा ! इंतज़ार रहेगा !

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    1. मम्मी की कवितायेँ इतनी रोचक हैं कि पढते २ मन नहीं भरता |इसका
      अगला भाग जल्दी ही पोस्ट करूंगी|
      आशा

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  4. बहुत सुन्दर सृजन, आभार.

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    1. आप तक यह कथा पहुंचा रही हूँ बहुत अच्छा लगा आपकी टिप्पणी देख कर |आशा

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  5. अच्छी कथा रोचक बुनावट लिए .

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    1. इसका अगला भाग जल्दी ही पोस्ट करूंगी |
      आशा

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  6. यह रचना मेरी माता जी ज्ञानवती किरण के द्वारा बाल साहित्य के लिए लिखी गयी थी जिसे मैं आप लोगों तक पहुंचाने की कोशिश कर रही हूँ इस ब्लॉग पर आने के लिए आभार |
    आशा

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    1. ब्लॉग पर आने के लिए धन्यवाद |
      आशा

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